एक किन्नर की आत्मकथा

न स्त्री न ही पुरुष हूँ मैं,
समाज निर्मित लिंग भेद का एकमात्र रहस्य हूँ मैं।।

पुरुषों सी प्रतीत होती हूँ,
गुण हैं सारे स्त्री वाले।
धोती कमीज का शौक नहीं मुझे,
चुडियाँ पसंद हैं,खनकने वाले।।

छक्का,किन्नर कह पुकारते हैं,
नाम है मेरे कितने आले।
बाँकी नज़रों से घुरा करते हैं,
नज़रिए जिनके खुद हैं काले।।

अपने अस्तित्व के लिए स्वयं लडता हूँ,
कोई कहाँ मेरा अपना है।
सारा जग बैरी है मेरा,
समानता का अधिकार ही बस एक सपना है।।

रेड लाइट पर नज़र आता हूँ,
तालियाँ मेरा आशीर्वाद हैं।
देता नहीं कोई नौकरी मुझको,
दुआंए ही मेरा कारोबार है।।

माँ ने अपनाने से किया इंकार,
पिता ने भी अपना नाम न दिया।
कचरे के डिब्बे मे फेंका,
हाय! मेरा बहुत तिरस्कार किया।।

ईश्वर का दिया वरदान मैं,
मैं भी इनको प्यारा हूँ।
देख क्यों मुँह मोड लेते हो,
क्या मैं कोई अनर्थ कहानी हूँ।।

मैं ही अस्तित्व,
मैं ही विश्वास हूँ।
मैं इंसान,
न संहार हूँ।।

हाँ मैं किन्नर हूँ।
हाँ, हाँ मैं किन्नर हूँ।।
तीनों लिंगों में सबसे निराला हूँ,
हाँ मैं किन्नर हूँ।
हाँ, हाँ मैं किन्नर हूँ।।

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