लिपि: उत्पत्ति, विवाद और आवश्यकता

लिपि: उत्पत्ति, विवाद और आवश्यकता
लिपि मनुष्य समाज के लिए एक वरदान है। भारत विश्व के सामने लिपि के संदर्भ में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर पाया। इतिहास हमें बताता है कि लिपि से संबंधित और उसके आविष्कार के प्रति हम भारतीय प्रारंभ से ही प्रयत्नशील रहे हैं सिंधु सभ्यता काल से लेकर आज तक लिपि का वह स्वरूप हमारे सम्मुख है जिसका चिंतन मनुष्य ने भाषा के प्रति ठोस रूप देने हेतु किया था । लिपि के आरंभ की कहानी प्राचीन ही नहीं है अपितु रोचक भी है, रोचक इसीलिए की अनेक विद्वान लिपि का जन्म भारतवर्ष को स्वीकार करते हैं जबकि पश्चिमी चिंतक यह तर्क देते हैं कि संसार की सभी भाषाओं और उसे रूप प्रदान करने वाली लिपि का जन्मदाता पश्चिम है। यूरोपीय विद्वानों के समर्थन में अनेक भारतीय विद्वान भी उनके स्वर में अपना स्वर मिलाते हुए यह तर्क देते हैं कि पश्चिम के देश अथवा भारत में लिपि का आगमन पश्चिम से हुआ है।
लिपि के उत्पत्ति के संबंध में विद्वानों में परस्पर मतभेद रहा है। विद्वानों का एक वर्ग लिपि के आविष्कर्ता के रूप में ब्रह्मा को मानता है। उनका कथन है और प्रबल मान्यता यही है कि भारत में लिपि के लिए आविष्कर्ता के रूप में और कोई नहीं केवल ‘ब्रह्मा’ हैं।

यह विद्वान नारद स्तुति का उदाहरण देते हुए अपने मत की पुष्टि करते हैं कि यदि ब्रह्मा ने लेखन कला का आविष्कार नहीं किया तो संसार आज लेखन कला से शून्य होता।

विद्वानों का दूसरा वर्ग इस मान्यता के विरोध में हैं। वह परंपरागत मान्यता का खंडन करते हुए विकासवाद के सिद्धांत को प्रमुख मानता है। उनके मतानुसार, “भाषा की भांति लिपि की मनुष्य के बुद्धि द्वारा अर्जित संपत्ति है और हमें इसी सिद्धांत पर लिपि का मूल्यांकन करना चाहिए।”

परंपरागत विद्वान अपने मत को बल देते हुए लिखते हैं, कि सरस्वती की वीणा हमें भाव और वर्ण इन दोनों को समझाने की चेष्टा करती है। वीणा के स्वर भाषा के ध्वनिमयी रूप को रेखांकित करते हैं, तो दूसरे हाथ में जो पुस्तक है वह हमें वर्ण के उद्भव की ओर संकेत करती है।

विकासवाद के सिद्धांत को मानने वाले सभी भाषा वैज्ञानिक इससे भारतीय कल्पना का संस्कारित रूप मानते हैं, और कहते हैं पुराकाल से चली आ रही भारतीय कल्पना बुद्धि वाद के बाद उसके उत्पत्ति को लेकर आंशिक भ्रमित करती है। वर्तमान युग में विद्वान तकनीक को प्रमुख मानते हैं इसीलिए विकासवादी सिद्धांत को मानने वाले लिपि की उत्पत्ति दैवीय कारण से मानने के लिए सदैव विरोध ही करते हैं।

प्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक देवेंद्र नाथ शर्मा, उदय नारायण तिवारी, धीरेंद्र वर्मा, अनंत चौधरी, भोलानाथ तिवारी, बाबूराम सक्सेना, गुणाकर मुले इन सभी ने लिपि की उत्पत्ति सहज और मनुष्य की आवश्यकताओं से जोड़कर माना है। आज भी विवाद है किंतु परंपरावादी और तर्क प्रस्तुत करने वाले विद्वानों के विचारों को आत्मसात करते हुए हम इतना कह सकते हैं कि मनुष्य की स्मृतियों का इतिहास बहुत बड़ा है कोई मनुष्य अनंतकाल तक अपनी बुद्धि के बल पर अपने अंसत में विचारों को अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रख सकता। उसकी आवश्यकता ही विस्मित हो जाने के भय से बचने के लिए शायद “लिपि” को जन्म दिया होगा।

आज हम कह सकते हैं कि मानव बुद्धि भी आवश्यकताओं को कालखंड के प्रभाव से बाहर आकर मनुष्य ने “लिपि” का आविष्कार किया होगा।

लिपि की तीन अवस्थाएं हैं–

  • चित्रलिपि
  • भावलिपि
  • वर्णात्मक/अक्षरात्मक लिपि

लिपि की कहानी और उसका आगमन कोई भी हो किंतु भारत में प्रत्येक काल में आवश्यकतानुसार अपनी लिपि का विकास हुआ। सैंधव लिपि, ब्राम्ही लिपि, खरोष्ठी लिपि इन सभी का विकास एक निश्चित क्रम से हुआ है। आज के निष्कर्ष और लिपि से संबंधित सभी तर्क यही सिद्ध करते हैं कि सैंधव लिपि के ज्ञान से पहले भारतीय लिपियों का आज श्रोत ब्राह्मी लिपि को माना जाता है। एक विद्वान मैक्स मूलर हुए हैं जो मानते हैं कि भारत में ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में लिपि का आविष्कार हुआ। अन्य विद्वान इस तिथि को चौथी से पांचवी शताब्दी तक ले जाते हैं।

लिपि का जन्म अनेक विद्वानों के मतानुसार, भारतीय परंपरा अनुसार किसी दैवीय शक्ति के आधार पर माना जा सकता है। ब्रह्मा को लिपि का जन्मदाता माना गया है। अधिकांश भारतीय विद्वान लिपि का जन्मदाता ब्रह्मा को स्वीकार करते हैं किंतु इस प्रकार का तर्क मानने वाले विद्वान और उनकी संख्या सीमित है।
मनुष्य सामाजिक संरचना का प्राणी है, समाज मनुष्य को जीवित बने रहने का माध्यम और व्यवस्था प्रदान करता है। मनुष्य के उद्भव के साथ ही उसके भीतर सामाजिक संरचना ने चिंतन के रूप में अवश्य जन्म लिया होगा।
समय की धाराओं ने उसके भीतर अंतर विवेक जागृत किया। साहस बटोरकर और अनेक काल–धाराओं में बहकर वह अपने भावों को जन्म दे पाया।
हम मान सकते हैं, लिपि का जन्म भी इसी प्रकार के क्षणों में अवश्य हुआ है। मान सकते हैं, भाषा के उपरांत लिपि का जन्म मनुष्य को पूर्ण स्थायित्व प्रदान कर गया। परिभाषाएं अनेक हैं और इन परिभाषाओं को अपने शब्दों में परिभाषित करना चाहे तो –

“लिपि उस संरचना का नाम है, उस व्यवस्था का नाम है जो अमूर्त भाषा को मूर्त रूप से व्यवस्थित रूप द्वारा प्रकट करती है। अतः ऐसी व्यवस्था जो अमूर्त में दिखाई पड़ने वाले स्वरूप को प्रकट कर दे, वह लिपि है।”

इस परिभाषा में असंख्य बोलियों, संवेदनाओं और भावों को लिपि के माध्यम से व्यवस्थित करके प्रकट करने की शक्ति लिपि द्वारा प्रस्तुत हुई। मनुष्य के सामाजिक बने रहने की शर्त और आवश्यकता लिपि द्वारा पूर्ण हुई। लिपि मनुष्य के सर्वश्रेष्ठ सृजनकारी तत्वों में सर्वप्रमुख है।
ऐतिहासिक सामग्री के अभाव में लिपि की उत्पत्ति और उसके स्थान के बारे में विवरण प्रस्तुत नहीं है पर इतना निश्चित है लिपि, साहित्य के अस्तित्व के बाद प्रस्तुत हुई।
इसमें सबसे बड़ी विशेषता यही है कि भाषा के संरक्षण और प्रसार को लिपि जीवित रखती है।
लिपि का उद्भव किसी देव– विधान से जोड़ने की परंपरा है, इस वास्तविकता के साथ-साथ हमें ध्यान रखना चाहिए मनुष्य ने अपने ज्ञान को सुरक्षित रखने के लिए लिपि को जन्म दिया। इन दो तर्कों के आधार पर कहा जा सकता है समय की धाराओं ने शब्दों को सुरक्षित रखने का साहस पहले मनुष्य के भीतर जन्मा तथा उसका भाव और विचार, लिपि रूप में प्रस्तुत हुआ इसीलिए लिपि की आवश्यकता मनुष्य की अपनी आवश्यकता थी। आज लिपि अनेकों युगों के उपरांत जिस रूप में प्रस्तुत है उसे संवारने के लिए न जाने कितनी भूले मनुष्य ने की होंगी।
लिपि के विकास को मुख्य रूप से 4 भागों में बांट सकते हैं–
1. प्रतीक लिपि – आदिकाल से मनुष्य प्रतीक रूप में भाषा का प्रयोग करता रहा है। प्रतीक भाषा के रूप में प्रस्तुत होकर मनुष्य के विचारों को प्रकट करते थे। वर्तमान युग में आज भी त्यौहार इसीलिए प्रतीक रूप में मनाए जाते हैं क्योंकि यह अपनी आदिमावस्था में इसी प्रकार के होंगे।
2. चित्र लिपि – लिपि का दूसरा आधार या पड़ाव चित्र लिपि है। मनुष्य ने भाव को चित्रांकन रूप देने का साहस जब भी किया, चित्र लिपि उसकी सहायक बनी।
3. विचार लिपि – लिपि का तीसरा पड़ाव विचार लिपि है। मनुष्य के मन में अनेक विचार आते हैं और उसने इसे अलग-अलग स्तरों पर अंकित करने का प्रयास किया तो ये विचार भले ही चित्रों के रूप में प्रस्तुत हों, भले ही भावों के रूप में प्रस्तुत हों, इसे विचार लिपि नाम दिया गया। आज भी चित्रकार के मस्तिष्क में अनेक विचार आते हैं उन विचारों को संगठित करके वह चित्र का निर्माण करता है, उस चित्र को देखकर सहृदय पुरुष उसके चित्र एवं उसके विचार की प्रशंसा करते हैं। चित्र विचारों में दु:ख का संयोजन करें तो दुखी विचार अश्रुपात के रूप में चित्रित होते हैं और यदि विचार आलिंगन के लिए हो तो प्रेम के चित्र के रूप में प्रस्तुत होते हैं।
4. ध्वनि लिपि – यहां पहुंचकर लिपि की अवस्था अंतिम पड़ाव तक पहुंची। हम मानते हैं लिपि के अंतर्गत ध्वनि के छोटे-छोटे खंडों को जब व्यवस्थित किया जाता है उसे लिपि कहा जाता है, यही ध्वनि चिन्ह जब लिखित भाषा में प्रस्तुत हुए तो ध्वन्यात्मक अथवा ध्वनि लिपि सामने आई।
हिंदी की विशेषता यही है कि यहां प्रत्येक वर्ण के लिए पृथक–पृथक ध्वनि योजना है। जैसे वर्ण और उसका लिखित रुप आज लिपि के द्वारा प्रकट होता है।

लेख का अगला क्रम सैंधव, ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपि का होगा तत्पश्चात देवनागरी लिपि के साथ हम प्रस्तुत होंगे।

संपादन–
अविरल अभिलाष
एडिटर UME

About The Author(s)

मेरा नाम अविरल अभिलाष मिश्र है।
मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजीडीएवी (सांध्य) कॉलेज से स्नातक किया है, वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस से परास्नातक कर रहा हूं।
नीलंबरा (कॉलेज मैगज़ीन) का संपादक भी रहा हूं।
इस समय साऊथ कैंपस हिंदी विभाग का छात्र प्रतिनिधि हूं तथा अनवॉइस्ड मीडिया के हिंदी संपादक के रूप में अपनी भूमिका का निर्वहन कर रहा हूं।
सादर!!

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