हक़ की आवाज़

हक़ की आवाज़
यहां हर रात तेरी हर दिन तेरा है
ये ज़मींं तेरी ये चमन भी तेरा है
फिर क्यों खिलने को तू दे अर्ज़ियाँ
क्यों तेरे हक़ पर ग़ालिब उसकी मर्ज़ियां
ये चौक तेरा ये बाज़ार तेरा है
ये दुकानें तेरी ये साज़ो-सामान तेरा है
फिर क्यों बेचने को तू दे अर्ज़ियाँ
क्यों तेरे कारोबार पर ग़ालिब उनकी मर्जियां
यहाँ हर ज़बान तेरी हर शख्स तेरा है
ये मेह़फिलें तेरी ये इंतजाम भी तेरा है
फिर क्यों बोलने को तू दे अर्ज़ियाँ
क्यों तेरे आवाज़ पर ग़ालिब उसकी मर्ज़ियां
यहाँ सब गलियां तेरी हर शहर तेरा है
यह आँगन तेरा यह घर भी तेरा है
फिर क्यों शहरियत की तू दे अर्ज़ियाँ
क्यों तेरे वजूद पर ग़ालिब उसकी मर्जियां
©गुलाम यज़दानी

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