देवनागरी

देवनागरी और नागरी नाम से जिस लिपि का संबंध आज जोड़ा जाता है इसके नाम को लेकर तर्क विचार विवाद और मतभेद इतने हैं, कि किसी एक निष्कर्ष पर किसी परिभाषा का निर्माण करना असंभव है।

नागरी नाम कब से प्रचलित है, निश्चित अनुमान के अभाव में इसका जन्म परिस्थितियों में ही इसे प्रदान किया है। तांत्रिक काल में पूजा विधान के अंतर्गत इसे ना करना हमसे जुड़ने का प्रयत्न किया गया।

देवताओं की मूर्तियां और इनकी उपासना संकेतों द्वारा कुछ सांकेतिक चिन्ह द्वारा की जाती थी। उसी से इसका नाम देवनागरी रखा गया। देवनगर जिसे आज काशी अथवा बनारस कहा जाता है जो शिक्षा और ज्ञात्म का गौरवपूर्ण स्थान रखता है इसी देव नगर में प्रवाहित अक्षर देवनागर कहलाई।

शिक्षित ब्राह्मण के पुस्तकों में स्थान विशेष आने पर वह नागर ब्राह्मण इसे देवनागरी प्रचारित करने में तनिक भी पीछे नहीं रहे। इसके अक्षर चतुर्भुजा आकार के होने के कारण अथवा अक्षरों में समय के साथ परिस्थितियों के जुड़ने से इसका नाम देवनागरी रखा गया।

देवनागरी
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प्राचीन समय में नगर विशेष काशी वाला मत अंत में सभी को स्वीकार करना पड़ा। और एक धारणा बनी काशी गौरवमय है, सभ्यता और संस्कृति दोनों में प्राचीन है, यहां प्रचलित देव भाषा संस्कृत में उपस्थित है, तो इसे देवनागरी शब्द प्रदान किया जाए।
किंतु यह परिभाषा अंतिम इसलिए भी है क्योंकि पूर्व के मत अनेक आधारों पर तर्क के साथ खंडित किए गए।

धीरेंद्र वर्मा, बाबूराम सक्सेना और भोलानाथ तिवारी अंत में अपना निष्कर्ष प्रदान करते हैं, संस्कृत प्राचीन भाषा है, हमारी विरासत है, यदि विरासत से किसी लिपि का जन्म मान लिया जाए तो इससे शब्द की सार्थकता और स्पष्टता अनेक सीमा तक समाधान को प्राप्त हो जाती है।

देवनागरी के नामकरण के कुछ अन्य आधार –––––

देवनागरी मध्य देश की लिपि है अनेक ग्रंथों में इसके विषय में लिखा है कि दक्षिण भारत में या लिपि नन्दिनागरी के नाम से प्रख्यात थी, वस्तुतः नन्दिनागरी से पूर्व इसे देवनागरी या देवनगर नाम की अस्तित्ववादी विचारधारा प्राप्त हो चुकी थी।
यह सर्वांग पूर्ण और भारत की देवनागरी नाम से ही सर्वाधिक प्रचलित लिखी थी, और है।
जिसे वर्तमान भारतीय संविधान में राष्ट्रीय लिपि स्वीकार किया गया। इस लिपि का नागरी या देवनागरी नाम के जो आधार प्रस्तुत हुए उनमें चार (4) सर्व प्रमुख हैं–––––

  1. बौद्धों के ग्रंथ ललित विस्तार में ‘नाग लिपि’ का उल्लेख है, ‘नाग लिपि’ से शब्द का रूपांतरण नागरी नाम में हुआ, जो बाद में पुनः परिवर्तित होकर काल सभ्यता, संस्कृति और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर देवनागरी नाम से अभिलक्षित हुई।
  2. भारतीय संस्कृति में निज भाषा का विशेष महत्व होता है। संस्कृत देववाणी तुल्य मानी जाती है काशी नगर इसी से संबंधित है, अतः देवनागरी पुरातन काल से एक भाषा के कारण जुड़ जाए इसीलिए इसका नाम देवनागरी हुआ।
  3. गुजरात के नागर जिनका संबंध नगर से जोड़ा गया जो ज्ञान और प्रमाण को महत्व देते थे। शायद नागर ब्राह्मणों में इस लिपि के प्रचलित होने के कारण इसका नाम नागरी रखा गया।
  4. सभी शोध अन्वेषकों, लिपि को नाम देने से पूर्व उसके इतिहास से परिचित होते हैं। देवनागरी लिपि सांकेतिक उपासनाओं के द्वारा समाज में प्रचलित रही होगी। अतः देवताओं की प्रतिमाओं को निर्मित करने के उपरांत उनकी पूजा विधि जिस माध्यम से संभव हुई, जिन त्रिकोणादि यंत्रों के बीच में इसके अक्षर निर्मित हुए। कालांतर में वही अक्षरों की लिपि देवनागरी रूप में सभी शोध अन्वेषकों को स्वीकार्य है।
    इन समस्त आधारों के होते हुए भी आज भी इसके नाम की कोई वैज्ञानिक एवं निर्णयात्मक व्याख्या नहीं की जा सकती। देवनागरी लिपि की विशेषताएं–––

देवनागरी को सर्वाधिक पूर्ण और संतुलित लिपि होने की योग्यता और गौरव प्रदान किया गया। इसकी विशेषताएं इस प्रकार से हैं–––––

1.. प्रत्येक ध्वनि के लिए स्वतंत्र चिन्ह है। जिनमें परस्पर भ्रम होने की कोई संभावना नहीं है।
2.. ब्राह्मी लिपि की सच्ची उत्तराधिकारिणी होने के कारण समस्त आधुनिक भारतीय लिपियां इससे संबंधित हैं।
3.. इसमें जो लिखा जाता है, वही पढ़ा जाता है। जो बोला जाता है, वही लिखा जाता है।
4.. ध्वनि प्रतीकों (अक्षर, चिन्ह) का क्रम वैज्ञानिक है। उनका अस्तित्व स्पष्ट और पूर्णत: विश्लेषणात्मक है।
5.. स्वरों में हृस्व और दीर्घ रूप के लिए अलग-अलग चिन्ह हैं, स्वरों की मात्राएं निश्चित हैं, प्रत्येक व्यंजन, स्वर के रूप को अंकित करती है।
6.. प्रत्येक स्वर अलग से अपना उच्चारण और लिखित चिन्ह द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है।
7.. यह लेखन और वचन दोनों ही दृष्टियों से सरल है एवम् सहज है।
8.. यह वेद वाणी से संपन्न होने के कारण शास्त्र सम्मत है।
9.. यह वैज्ञानिक पद्धति से निर्मित होने के कारण सरलता से सीखी जा सकती है।
10.. संसार की कोई भी भाषा इसके माध्यम से सफलतापूर्वक सीखी जा सकती है। इसकी वर्णमाला और वर्तनी को सीख लेने के कारण हमें रटने की आवश्यकता नहीं पड़ती। केवल शब्दों का शुद्ध उच्चारण जानने से ही हम उनका शुद्ध रूप लिख सकते हैं।
11.. आज की देवनागरी और उसका वर्तमान स्वरूप अनेक युगों के प्रयोग पर आधारित है। इसी कारण इस लिपि में एक समुचित दीर्घ परंपरा प्राप्त होती है।
12.. इसके सीखने की कला है एक ध्वनि के लिए एक ही लिपि चिन्ह है। रोमन की भांति हमें लिखने के लिए छोटे– बड़े दो रूप अलग से प्रयोग करने की कोई आवश्यकता नहीं होती।
13.. इसमें उच्चरित ध्वनियां ही अंकित होती हैं अनुच्चरित ध्वनियां नहीं लिखी जाती हैं। रोमन लिपि में इस प्रकार का क्रम हम देख सकते हैं।
14.. अति शीघ्र लेखन के लिए (त्वरा लेखन) यह लिपि अनुकूल है।
15.. भारत की अंतर्देशीय लिपि तो है ही किंतु अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अनेक पाश्चात्य लेखक आंशिक जानकारी के साथ अधिकार पूर्वक लिख रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मंच पर अनेक साहित्यकारों की प्रमुख कृतियों का अनुवाद इसे और अधिक प्रमाणिक सिद्ध करता है।
16.. देवनागरी लिपि भारतीय वांग्मय की एक अति महत्वपूर्ण लिपि है। भले ही निवासियों की उपेक्षा नीति के कारण, भले ही अंग्रेजी समर्थक या हिंदी विरोधियों के सामूहिक षड्यंत्रों के उपरांत भी देवनागरी का स्थान अप्रतिम है।
                 त्रुटियां –––

विशेषताओं के होते हुए भी देवनागरी लिपि में भी कुछ अभाव वह त्रुटियां हैं, जिसके व्यापक प्रयोग में बाधक हैं–––––

1.. नागरी लिपि की लिखावट जटिल है क्योंकि कुछ मात्राएं शिरोरेखा के ऊपर लगती हैं तो कुछ वर्ण के नीचे।
2.. संयुक्त अक्षरों को लिखने और पढ़ने में कठिनाई होती है।
उदाहरण स्वरूप प्रेम शब्द में ‘र’ का उच्चारण मध्य में है किंतु उसका उल्लेख ‘प’ के साथ किया जाता है। इसी प्रकार द्रोह शब्द में ‘र’ की स्थिति भ्रम की स्थिति उत्पन्न करती है।
3.. वर्णों की अधिकता के कारण और मात्रा विधान की जटिलता के कारण आलोचक शीघ्रलेखन, मुद्रण और टंकण आदि में विशेष कठिनाई घोषित करते हैं।
4.. देवनागरी के अंतर्गत अनुस्वार और अनुनासिक के प्रयोग का कोई भी निश्चित नियम नहीं है। अतः यह भी त्रुटि या भ्रम की स्थिति उत्पन्न करते हैं।
5.. नागरी में ‘र’ के चार (4) रूप हैं। यह चारों रूप विविध प्रयोग के कारण अवैज्ञानिक और अनुपयोगी हैं।
‘र’ की स्थिति को लेकर, कभी-कभी तो यह वर्ण दूसरे वर्ण का अतिक्रमण कर जाता है।
6.. नागरी लिपि लिखने के लिए बार-बार अपने हाथों को उठाना पड़ता है। कभी मात्रा प्रयोग के लिए, कभी शिरोरेखा लगाने के लिए, कभी अनुस्वार के लिए, तो कभी विराम चिन्ह के लिए, इससे श्रम अधिक होता है और गति मंद पड़ती है।
7.. आधुनिक समाज की टंकण पद्धति के आगे समय, श्रम, स्थान इन तीनों के सम्मुख देवनागरी लिपि अधिक स्थान और अधिक समय ग्रहण करती है, रोमन इसके विपरीत है।

देवनागरी लिपि को इन त्रुटियों के बावजूद आलोचक इसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हैं। विभिन्न सुधारों की आवश्यकताओं पर बल देते हैं। इसीलिए लेखन की दृष्टि से और टाइप यंत्रों की दृष्टि से भी आज, काफी सीमा तक इस स्थिति में देवनागरी लिपि पहुंच गई है कि लगातार पाठ्य ग्रंथ और साहित्य हमारे सम्मुख प्रस्तुत होता जा रहा है।

देवनागरी लिपि का मानकीकरण–––

मानकीकरण से अभिप्राय–– मानक शब्द अंग्रेजी के स्टैंडर्ड शब्द के अनुपात पर गढ़ा गया है। यह हिंदी प्रतिरूप है। मानक के लिए चार (4) अर्थ प्रयोग किए जाते हैं–––

  1. शुद्ध
  2. आदर्श
  3. उचित और
  4. योग्य।
    मानक शब्द के नए अर्थ भी आज प्रचलित हैं।
    जैसे – जीवंत भाषा
    शुद्ध भाषा
    व्याकरण सम्मत भाषा अर्थ माना जाता है।
    समाज जिस भाषा का प्रयोग सर्वाधिक करता है वही भाषा समाज अंततः मानक शब्दों को अपनी स्वीकृति देता है। इसका अर्थ यह हुआ कि मानकता आधार व्याकरण न होकर व्यापक भाषा जनसमूह समाज द्वारा स्वीकृति प्रदान करने से होता है।
    किसी सभ्य समाज के सामान्य और महत्वपूर्ण तथा शिष्ट और अशिष्ट लोगों की पारस्परिक शब्दों का वह रूप स्थिर होता है जब वह शब्द अधिकांश में उच्चारण के योग्य बनता है।

लिपि के संदर्भ में मानक से अभिप्राय लिपि में व्याप्त विकल्पों में से एक ऐसे विकल्प का चयन करना जिसके अनुसरण द्वारा देवनागरी लिपि में मानकता स्थिर दिखलाई देती है।

प्रिय पाठकों, लेख का अगला क्रम में हम देवनागरी लिपि के दोष और उपाय, अंतर्राष्ट्रीय लिपि के रूप में देवनागरी, आदर्श लिपि के गुण और देवनागरी लिपि के साथ प्रस्तुत होंगे।।
आपका अपार प्यार और स्नेह देते रहें।

“पाथेय” पत्रिका जो आईएसबीएन नंबर (ISBN No.) के साथ प्रकाशित हो रही है, उसके लिए अपने लेख आगामी 5 सितंबर तक भेज दें यही इसकी अंतिम तिथि है, भेजने के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें।

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About The Author(s)

मेरा नाम अविरल अभिलाष मिश्र है।
मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजीडीएवी (सांध्य) कॉलेज से स्नातक किया है, वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस से परास्नातक कर रहा हूं।
नीलंबरा (कॉलेज मैगज़ीन) का संपादक भी रहा हूं।
इस समय साऊथ कैंपस हिंदी विभाग का छात्र प्रतिनिधि हूं तथा अनवॉइस्ड मीडिया के हिंदी संपादक के रूप में अपनी भूमिका का निर्वहन कर रहा हूं।
सादर!!

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