जब कलम मैं उठाता हूँ ।।

जब कलम मैं उठाता हूँ
कोरे कागज़ पर कलम पकड़े
मेरे हाथों की परछाई, न कुछ बोलती है
न कुछ करती है
सुबह से शाम, शाम से रात ढल जाती है
जब कलम मैं उठाता हूँ
विरान कोरी राह में नफ्स का साथ निभाता हूँ।।

कितनी तेज़ धधकती आग
कितनी भारी शाम
सिहर-सिहरकर फूटती नहीं जिससे दो बातें
उस परवाने की आवाज़ बन जाता हूँ
उपवन के कोने में
जो बैठ गई हो रूठ प्रियतमा
उसकी यादों की परछाई बन जाता हूँ
जब कलम मैं उठाता हूँ
वो आती पग ध्वनि
के मोह और प्रेम का फर्क बन जाता हूँ।।

पराजित सूरज कोई अगर
क्षितिज कि ओर झुकने लगे
उसकी किरणों का
नया स्रोत बन जाता हूँ
जब कलम मैं उठाता हूँ
हारते काल की धार में
जीत का नया समय बन जाता हूँ।।

लिखता हूँ कोई अफसाना नहीं
तस्वीर सा दिखता है जो आलम
चित्रकार नहीं नफ्स कलम से वही दर्शाता हूँ
जब कलम मैं उठाता हूँ
समाज का आइना बन जाता हूँ
किसी के चिखते जिस्म की आवाज
तो कभी भडकते दंगों के कत्लेआम
का गवाह बन जाता हूँ
जब कलम मैं उठाता हूँ
सेज पर चादर तान
सोती सरकार जगाता हूँ।।

जो मेरी कविताओं का भी मोल लगाए
उस बाज़ार का हाल बताता हूँ
नफ्स हूँ मैं
कलम की नोख से अपनी बात बताता हूँ।।

-ketan(nafs)

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