इश्क़

जागते हैं और ख़्वाब ढूँढते हैं
गुल-ए-गुलिस्ताँ में गुलाब ढूँढते हैं

इश्क़ का ढाई अक्षर हो लिखा जहाँ,
हम आजकल वो किताब ढूँढते हैं

सहरा, के रेत ही रेत अब चारों ओर,
सुकूँ-ए-दिल के लिए शराब ढूँढते हैं

चिराग, हिज्र की आँधियों में बुझता रहा,
चिराग-ए-रौशन हो, आफ़ताब ढूँढते हैं

और रात सियाह, फ़िर घेरा तन्हाई ने,
कि तन्हा रातों में फ़िर मेहताब ढूँढते हैं

नाम-ए-ज़िक्र उसका, दास्ताँ मुक़म्मल मेरी,
तस्वीरों में था, वो चेहरा नायाब ढूँढते हैं

Rahul Darak

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