शायद,कल फिर हो न हो

शायद,कल फिर हो न हो

हस्ती- मुस्कुराती ज़िंदगी मे मेरी
वो हसीं पल, फिर हो न हो
बांध चले थे रिश्ते कही सारे
उन रिश्तो का संग,फिर हो न हो
खाबों से उतर आ आज तू
शायद,कल फिर हो न हो। -२

कई लम्हे जो साथ बिताए थे
आंखों से अश्क बहाये थे
सपने जो मैंने सजाये थे
उन सपनो का संग फिर हो न हो
लौट आ फिर आज तू
शायद,कल फिर हो न हो।-२

तेरी तसव्वुर को वो तरसती नज़रे
रुख़शत फिर तुझसे हो न हो
बदलती तेरी नज़ाकत देखकर
मिलना तुझसे फिर हो न हो
इक पल आज मिला है हमें
शायद,कल फिर हो न हो।-२

इक अरसा गुज़रा है तेरी यादो में
बिन नींदों की मेरी रातो में
मुक्कमल हँसी फिर हो न हो
जज़्बात बदल जाये मेरे
तलब वैसी फिर हो न हो
लौट आ फिर आज तू
शायद कल फिर हो न हो।
शायद कल फिर हो न हो।।

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